
maa-baap-ki-dard-bhari-kavita
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बिना बात के बात बनाने लग गए, बिना काम के बहाने बनाकर पास बैठने लग गए। जो हमारी टूटी-फूटी, तोतली आवाज़ भी समझ लेते थे, आज उनकी लड़खड़ाती आवाज़ हम समझ नहीं पा रहे हैं। जो हमारे रूठने पर मनाते-मनाते नहीं थकते थे, बिना हमें खिलाए, खुद एक निवाला भी नहीं खाते थे। वही अब मना रहे है खुद को बीमार पड़ जाने को, रोटी न सही दवा ही मिल जाए बेटे के हाथ से खाने को। ऐसे तो सब कुछ भूल गए हैं वो, दिन-रात का फ़र्क भी मानो मिटा दिया है उन्होंने। पर कोई पूछ ले उनसे उनके बच्चों का नाम, उँगलियों पर गिन-गिनकर बता देते हैं वो। बचपन में जो स्कूल का बैग भी उठाने नहीं देते थे, वो आज कैसे इतना भारी बोझ कंधों पर रखकर चले गए। आज बहुत रोना चाहा, पर आँसू का एक कतरा भी नहीं निकला, शायद आँखें भी समझ गईं कि आँसू पोंछने वाला, और उन्हें मोती की कीमत समझने वाला, चले गए हैं वो। By Raju Raj
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