
ek-tarfa-mohabbat-heart-touching-sad-poem-hindi
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adhuri-mohabbat-part-3 जो कभी मेरा थी ही नहीं, उसके लिए आँख नम हो गई, एक शख़्स के जाने से, ज़िंदगी बेरंग हो गई। उससे क्या करूँ शिकवा, वो तो गैर थी, धोखा तो अपना दिल ने दिया, अपना था फिर भी गैर का हो गया। एक तरफ़ा मोहब्बत का मज़ा ही अलग होता है, इसमें कोई शिकवा-शिकायत नहीं होता, ज़िंदगी इंतज़ार में बीत जाती, पर रूठ कर जाने का जी नहीं करता। कसूर मेरा ही था, उनके मज़ाक से मोहब्बत कर बैठे, मज़ाक बन गई है ज़िंदगी, जब से उनसे मोहब्बत कर बैठे। मुक़द्दर में जो थी ही नहीं, उसे अपना मान बैठे, दिल में जो थी, वो हाथ की लकीर में नहीं। काश दिल भी, उसी पर फिसलता, जो मुक़द्दर में होता, तो आज मैं ये दास्तां नहीं लिखता। वो कितना खुश-नसीब होगा, माथे पे उसके कैसा लकीर होगा, जिसके लिए मेरी ज़िंदगी तबाह हो गई, वो चंद फेरों में किसी का नसीब हो गई। पूछना था ख़ुदा से कुछ सवाल, ख़्वाब मेरे अधूरे क्यों रह गए, जो हमसफ़र थी ही नहीं, सफ़र में मिलवाया उसे किसलिए। जिससे मेरे दिल रोशन होता था, वो किसी और घर की रौशनी बन गई, उसके जाने से, दिल की नहीं, ज़िंदगी की रौशनी बुझ गई। यह एक Poetry Series है, इसके बाकी पार्ट भी पढ़ें: by Raju Raj
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