adhuri-mohabbat-part-1
§ 💔 दर्द / Sad1,400 reads

adhuri-mohabbat-part-1

┌──┐└──┘
मुस्कुरा कर जब वो देखती थी, शर्मा कर वो घबराती थी, कितनी मासूम थी वो, जो मेरे दिल में रहा करती थी। देखे थे और भी कई खूबसूरत चेहरे मैंने, पर साँवली सूरत पर ही, दिल फिसल गए थे मेरे, एक अजनबी मेरे दिल की मेहमान बन गई, और हम उनके मेज़बान बन गए। पलकें झुका के वो जो सवाल करती, मुस्कुराकर जो मुझसे वो बात करती, आँखें मिलते ही वो शर्मा जाती, अपनी मोहब्बत को इस तरह वो छुपा लेती। कुछ इस तरह उनसे मुलाक़ात होती, दिन भर ख़यालों में ही उनसे बात होती, दिल बेचैन हो उठा उस दिन, जिस दिन कहकर वो पास न होती। कितने ख़याल मैं मन में लेकर आता था, पर उनसे कह कुछ न पाता था, वो मंद-मंद मुस्कुराती थी, इस तरह अपना प्यार का जाल बिछाती थी। पता नहीं था, है ये एकतरफ़ा मोहब्बत, या आग उधर भी लगी थी, इस मोहब्बत की दाह में दिल किस-किस की जली थी, हम इंतज़ार करते रहे एक-दूसरे के इज़हार का, इस तरह गला घोंट लिया हमने अपने प्यार का। बिछड़ गया हूँ उनसे, फिर भी दिल में कहीं इंतज़ार है, किसी दिन मिलेगी वो, उनके लिए दिल बेकरार है। खेल तो मेरे से सबने खेला, कभी मुक़द्दर, तो कभी महबूब, देखना है मुक़द्दर का अब खेल, मौत पहले गले लगाती है, या महबूब। यह एक Poetry Series है, इसके बाकी पार्ट भी पढ़ें:

— shayariprime.com

🔗 Share this Kavita:WhatsAppTwitter / XFacebook
∿ ∿ ∿