ankahi-mohabbat-usi-ke-naam-se-mashhoor-ho-gaya
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ankahi-mohabbat-usi-ke-naam-se-mashhoor-ho-gaya

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मेहबूब मैं तुमसे महरूम हो गया, ख्वाहिश थी तुम्हें खुश देखने की, इसीलिए तुमसे दूर हो गया। कर न सका इज़हार-ए-मोहब्बत, इसलिए तेरी नज़र में मैं मकरूर हो गया। मालूम था तुम्हें भी मेरे दिल की हालत। पर जब तुमने पूछा, मैं खामोश रह गया। शब्दों से कहता तो वो प्यार नहीं होता, जज़्बात को जो तुम न समझी, उसे अल्फाज़ से मैं क्या समझाता, इसीलिए मैंने भी कह दिया, तुमसे कभी प्यार नहीं किया। फिर हम साथ में मुस्कुराए थे, अपने जज़्बात को हम इस तरह छिपाए थे, बता नहीं कैसी हंसी थी मेरी, जिससे आंखों में मोती सज रहे थे, जब एक मोती हमसे बिछड़ रही थी। कितनी मुश्किल थी दोनों मोतियों को संभालना, एक जो आंख से निकल रही थी, और एक जो दिल से। चाहकर भी उसे आवाज़ दे न सका। पलटकर चाहा देखना, पर देख न सका। पलभर में वो हमसे दूर हो गई, या फिर वो मेरे दिल के और करीब हो गई। अब उसकी यादों ने घर बसा लिया मेरे दिल में, अब उसकी यादों का दर्द ही मेरा सुकून हो गया। जिसे पा न सका, उसी के नाम से मशहूर हो गया।

— shayariprime.com

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